Bhishma Stuti

Bhishma Stuti PDF एक अत्यंत पवित्र और भावपूर्ण स्तुति है, जो श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध, नवम अध्याय (युधिष्ठिर राज्य प्रलम्भ) में वर्णित है। यह स्तुति महाभारत के महान योद्धा पितामह भीष्म द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित अंतिम दिव्य प्रार्थना है।

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भीष्म स्तुति का परिचय (Bhishma Stuti Introduction)

भीष्म स्तुति वह दुर्लभ क्षण दर्शाती है जब शरशय्या पर लेटे हुए पितामह भीष्म अपने अंतिम समय में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए उनकी लीलाओं, रूप और करुणा का वर्णन करते हैं।
यह स्तुति भक्ति, वैराग्य और मोक्ष का अद्भुत संगम है।

शास्त्र संदर्भ

श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
प्रथम स्कन्धे युधिष्ठिरराज्यप्रलम्भः नाम नवमोऽध्यायः ॥

Bhishma Stuti Lyrics (संस्कृत पाठ)

(श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथम स्कन्धे युधिष्ठिरराज्यप्रलम्भः नाम नवमोऽध्यायः ॥) श्री भीष्म उवाच – इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वत पुङ्गवे विभूम्नि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥ ३२॥ त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने । वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥ ३३॥ युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलंकृतास्ये । मम निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥ ३४॥ सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य । स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थ सखे रतिर्ममास्तु ॥ ३५॥ व्यवहित पृथनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या। कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ३६॥ स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः । धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलत्गुः हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ३७॥ शितविशिखहतोविशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥ ३८॥ विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये। भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षोः यमिह निरीक्ष्य हताः गताः सरूपम् ॥ ३९॥ ललित गति विलास वल्गुहास प्रणय निरीक्षण कल्पितोरुमानाः । कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्वः ॥ ४०॥ मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तः सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् । अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशि गोचर एष आविरात्मा ॥ ४१॥ तमिममहमजं शरीरभाजां हृदिहृदि धिष्टितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥ ४२॥ श्री सूत उवाच – कृष्ण एवं भगवति मनोवाग्दृष्टिवृत्तिभिः । आत्मन्यात्मानमावेश्य सोऽन्तः श्वासमुपारमत् ॥ ४३॥ ॥ इति॥

भीष्म स्तुति के लाभ (Benefits of Bhishma Stuti)

Bhishma Stuti का नियमित पाठ करने से:

  • मन में भक्ति और वैराग्य बढ़ता है
  • मृत्यु का भय कम होता है
  • श्रीकृष्ण के चरणों में अटूट श्रद्धा बनती है
  • जीवन के कष्ट और मानसिक अशांति दूर होती है
  • मोक्ष मार्ग की भावना जागृत होती है

भीष्म स्तुति केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक भक्त के जीवन का अंतिम और सर्वोच्च समर्पण है। यह हमें सिखाती है कि चाहे जीवन कितना भी संघर्षपूर्ण क्यों न हो, अंत में भगवान श्रीकृष्ण की शरण ही परम शांति देती है।

भीष्म स्तुति का हिंदी अर्थ (Bhishma Stuti Meaning in Hindi)

श्लोक 32 का अर्थ:
पितामह भीष्म कहते हैं – मेरी बुद्धि अब संसारिक इच्छाओं से मुक्त होकर उस सर्वश्रेष्ठ भगवान श्रीकृष्ण में स्थिर हो गई है, जो सत्त्वगुण के अधिपति और समस्त ब्रह्मांड के कारण हैं।

श्लोक 33 का अर्थ:
जो भगवान तीनों लोकों को मोहित करने वाले, श्याम वर्ण, पीतांबरधारी, सुंदर मुखकमल वाले और अर्जुन के सखा हैं – उनमें मेरी निष्कलंक भक्ति बनी रहे।

श्लोक 34–38 का सार:
भीष्म भगवान श्रीकृष्ण को युद्धभूमि में अर्जुन की रक्षा करते, अपने वचन तोड़ते हुए रथ से उतरकर भीष्म की ओर आते हुए याद करते हैं। वे कहते हैं – वही भगवान मुकुंद मेरी परम गति हों।

श्लोक 39–42 का भावार्थ:
भगवान श्रीकृष्ण का वही रूप, जिसे गोपियाँ, ऋषि, राजा और स्वयं भीष्म देखते हैं, वही मेरे हृदय में स्थित परमात्मा हैं। अब मेरा मोह नष्ट हो चुका है।

श्लोक 43 (सूतजी उवाच):
सूतजी कहते हैं – इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण में मन, वाणी और दृष्टि को एकाग्र करके भीष्म ने अपने प्राण त्याग दिए।

Bhishma Stuti pdf


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